उत्पादन फलन और एक कारक के प्रतिफल | Production Function and Returns to a Factor.

उत्पादन फलन की अवधारणा

उत्पादन फलन और एक कारक के प्रतिफल | Production Function and Returns to a Factor.

उत्पादन के लिए लागत की जरूरत होती है भूमि श्रम तथा पूँजी वस्तु तथा सेवाओं के उत्पादन के लिए जाने या पहचाने जाने वाले आम लागत हैं एक उत्पादक होने के नाते आपकी रुचि यह जानने की होगी कि वस्तु की एक दी हुई मात्रा का उत्पादन करने के लिए कितने श्रम और पूँजी की मात्रा की आवश्यकता होगी

उदाहरण के लिए आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि एक वस्तु की 100 इकाइयों का उत्पादन करने के लिए पूँजी की 10 इकाइयों और श्रम की 5 इकाइयों की आवश्यकता है भौतिक आगे तो जैसे पूँजी की 10 इकाइयों तथा श्रम की 5 इकाइयों तथा भौतिक उत्पाद उत्पादित वस्तुओं की 100 इकाइयों के बीच यह संबंधी अर्थ-शास्त्र में उत्पादन फलन कहलाता है.

अतः उत्पादन फलन से अभिप्राय एक वस्तु के भौतिक आदतों तथा भौतिक उत्पादन के बीच पाए जाने वाले फल नाथ मक संबंध से है अन्य शब्दों में उत्पादन फलन किसी फर्म के उत्पादन तथा उत्पादन के भौतिक कारकों के बीच तकनीकी संबंध को व्यक्त करता है जिसको अलग तरीके से व्यक्त किया जा सकता है

QX=f(L,K)

(यहां X का मतलब वस्तु का भौतिक उत्पादन L का मतलब श्रम की भौतिक इकाई तथा K का मतलब पूँजी की भौतिक इकाई तथा इसका मतलब फलन से है)

वॉटसन के शब्दों में एक फर्म के भौतिक उत्पादन और उत्पादन के भौतिक कारकों के संबंध को उत्पादन फलन कहा जाता है


यहां ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है के उत्पादन फलन कार्य को तथा उत्पादन के बीच कोई आर्थिक संबंध स्थापित नहीं करता है यह तो केवल कार्य को तथा उत्पादन के बीच तकनीकी संबंध को स्थापित करता है इंजीनियर हमें बता सकते हैं कि 2 मशीनों पर 10 श्रमिकों के काम करने से वस्तु  X की अधिकतम 100 इकाइयों का उत्पादन होगा





यहां समान रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्पादन फलन की परिभाषा सदा एक दी हुई प्रौद्योगिकी अथवा एक दिए हुए तकनीकी ज्ञान के रूप में की जाती है समय के साथ-साथ तकनीकी ज्ञान में सुधार हो सकता है इसके अनुसार वस्तु X की 110 इकाइयों का उत्पादन समान भौतिक आदतों द्वारा संभव हो सकता है यह उत्पादन फलन के खिसकाव की स्थिति है



स्थिर तथा परिवर्ती कारक

उत्पादन के कारकों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है-

स्थिर कारक

परिवर्ती कारक


स्थिर कारक वह कारक हैं जिनका प्रयोग उत्पादन में परिवर्तन होने से परिवर्तित नहीं होता असल में स्थिर कार्य को को उत्पादन के वास्तव में शुरू होने से पहले ही जोड़ या लगा दिया जाता है अतः मशीन वहां बनी रहती है बेशक उत्पादन सुनने ही क्यों ना हो हम मान लेते हैं कि मशीन वस्तु X की अधिकतम 1000 इकाइयों का उत्पादन कर सकती है इसका अर्थ यह हुआ कि 0 से 1000 इकाइयों के बीच उत्पादन में किसी भी परिवर्तन के लिए मशीन एक आदत के रूप में समान बनी रहेगी

परिवर्ती कारक में कारक हैं जिनका प्रयोग उत्पादन में परिवर्तन होने से परिवर्तित होता है श्रम परिवर्ती कारक का एक उदाहरण है अन्य बातें समान रहने पर एक वस्तु की अधिक इकाइयों का उत्पादन करने के लिए हमें अधिक श्रम की आवश्यकता होती है इसलिए परिवर्ती कारक का प्रयोग तब सुनने होगा जब उत्पादन सुनने है इसमें उत्पादन में वृद्धि के साथ वृद्धि होती है

परिवर्ती कारक के कुल उत्पाद,सीमांत उत्पाद तथा औसत उत्पाद-


कुल उत्पाद-

यह उत्पाद या वस्तु का वह कुल जोड़ है जो उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग हुए स्थिर कारकों की कुछ मात्रा के साथ एक परिवर्तनशील कारक की सभी इकाइयों द्वारा उत्पादित किया जाता है

उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग हुई परिवर्तनशील कारक की प्रत्येक इकाई के उत्पादन का कुल जोड़ कुल उत्पाद है इसे परिवर्तनशील कारक का कुल प्रतिफल भी कहते हैं

सीमांत उत्पाद-
अन्य कारकों के समान रहने पर सीमांत उत्पाद वह अतिरिक्त उत्पादन है जो परिवर्ती कारक की एक अतिरिक्त इकाई के
लगाने के कारण प्राप्त होता है

औसत उत्पाद-
उत्पादन प्रक्रिया में प्रयुक्त परिवर्ती कारक के प्रति इकाई उत्पादन को औसत उत्पाद का जाता है 
औसत उत्पाद से अभिप्राय उत्पादन प्रक्रिया के दौरान परिवर्ती कारक के प्रति इकाई भौतिक उत्पाद से है

ऋणात्मक सीमांत उत्पादन-
कुछ अवस्थाओं में सीमांत उत्पादन ऋणात्मक हो सकता है विशेष-कर उन अवस्थाओं में जब अत्यधिक रोज़गार अथवा
अदृश्य बेरोज़गारी हो जैसा कि भारत में कुछ सार्वजनिक उद्यमों में है अत्यधिक रोज़गार श्रमिकों की कुल कार्य क्षमता में
रुकावट पैदा करता है जिसके कारण सीमांत उत्पादन कम हो सकता है ऐसी स्थिति में कुल उत्पादन में वृद्धि होती है जब
कुछ श्रमिकों को काम से हटाया जाता है

कारक के प्रतिफल-परिवर्ती अनुपात का नियम-


उस स्थिति पर ध्यान दें जब भूमि एक स्थिर साधन और श्रम एक परिवर्ती साधन है तथा किसान गेहूं का उत्पादन कर रहा है क्योंकि भूमि एक स्थिर साधन है श्रम का अधिक से अधिक मात्रा में प्रयोग करके किसान गेहूं की अधिक मात्रा का उत्पादन कर सकता है यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न आता है भूमि के स्थिर मात्रा पर श्रम की अतिरिक्त इकाइयों के लगाने से क्या गेहूं का अतिरिक्त उत्पादन सामान्य पहले जैसा रहेगा अन्य शब्दों में क्या शर्म की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के लगाने से श्रम का सीमांत उत्पादन सामान्य पहले जैसा रहेगा ऐसा मत कहना कि हो सकता है यह कभी भी नहीं हो सकता यदि श्रम का सीमांत उत्पादन समान रहता है तब भारत जैसे देश में भूमि के
समान टुकड़े का प्रयोग करके गेहूं की कितने भी मात्रा या अधिक से अधिक मात्रा पैदा की जा सकती है भारत को कभी भी तब खाद्य समस्या का सामना नहीं करना पड़ता परंतु सही बात यह है कि सीमांत उत्पादन में अंतर होता है

परिवर्ती अनुपात का नियम बताता है कि स्थिर कारक के साथ परिवर्ती कारक के अधिक इकाइयों को जैसे-जैसे प्रयोग में लाया जाता है अंततः एक अवस्था ऐसी अवश्य आती है जब परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पादन गिरना शुरू हो जाता है

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